127वीं शहादत दिवस पर याद किए गए अमर क्रांतिकारी वासुदेव हरि चापेकर

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत और महान क्रांतिकारी वासुदेव हरि चापेकर को उनकी 127वीं शहादत दिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पुणे के चिंचवड़ निवासी वासुदेव हरि चापेकर, प्रसिद्ध चापेकर बंधुओं में सबसे छोटे थे, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति की पहली चिंगारी प्रज्वलित की।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरित चापेकर बंधु युवाओं में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए “चापेकर क्लब” संचालित करते थे, जहां युवाओं को लाठी और भाला चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता था।

सन् 1897 में पुणे में फैली प्लेग महामारी के दौरान तत्कालीन प्लेग कमिश्नर डब्ल्यू. सी. रैंड ने महामारी नियंत्रण के नाम पर भारतीयों के घरों में जबरन प्रवेश, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तथा धार्मिक भावनाओं को आहत करने जैसी घटनाओं को अंजाम दिया। इससे जनता में भारी आक्रोश फैल गया।

22 जून 1897 की रात, महारानी विक्टोरिया की हीरक जयंती समारोह से लौट रहे रैंड पर गणेशखिंड रोड पर चापेकर बंधुओं ने हमला किया। बड़े भाई दामोदर हरि चापेकर ने रैंड को गोली मारी, जबकि वासुदेव हरि चापेकर ने उसके सैन्य एस्कॉर्ट लेफ्टिनेंट आयर्स्ट को मार गिराया। इस घटना ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी और भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को नई दिशा दी।

घटना के बाद दोनों भाई फरार हो गए, लेकिन बाद में मुखबिरी के चलते वासुदेव चापेकर और उनके सहयोगी महादेव रानाडे गिरफ्तार कर लिए गए। जेल में वासुदेव ने निर्भीकता से अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा था—

“हमने अत्याचारी को मारा, कोई पाप नहीं किया।”

8 मई 1899 को पुणे की यरवदा जेल में मात्र 19 वर्ष की आयु में वासुदेव हरि चापेकर को फांसी दे दी गई। बाद में उनके बड़े भाई दामोदर चापेकर और मंझले भाई बालकृष्ण चापेकर को भी अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया।

इतिहासकारों के अनुसार रैंड वध भारत में किसी अंग्रेज अधिकारी की पहली लक्षित हत्या थी, जिसने यह संदेश दिया कि भारतीय अब अत्याचार सहने के लिए तैयार नहीं हैं। चापेकर बंधुओं के बलिदान ने आगे चलकर महाराष्ट्र, बंगाल, पंजाब और अनुशीलन समिति जैसे क्रांतिकारी संगठनों को प्रेरणा दी।

इस अवसर पर स्वतंत्रता आंदोलन यादगार समिति के अध्यक्ष और सिनेमेटोग्राफर प्रशांत सी. बाजपेयी ने कहा कि चापेकर बंधुओं का बलिदान भारतीय युवाओं के लिए आज भी राष्ट्रभक्ति, साहस और त्याग की अमिट मिसाल है।

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